हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.48.9

मंडल 10 → सूक्त 48 → श्लोक 9 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 48
प्र मे॒ नमी॑ सा॒प्य इ॒षे भु॒जे भू॒द्गवा॒मेषे॑ स॒ख्या कृ॑णुत द्वि॒ता । दि॒द्युं यद॑स्य समि॒थेषु॑ मं॒हय॒मादिदे॑नं॒ शंस्य॑मु॒क्थ्यं॑ करम् ॥ (९)
मेरे स्तोता सबके आश्रय योग्य तथा अन्न व भोगों के दाता होते हैं. लोग गायों को खोजने एवं मित्रता पाने के लिए दो प्रकार से मेरी स्तुति करते हैं. मैं जब अपने स्तोता की विजय के लिए युद्धों में आयुध ग्रहण करता हूं, तब इसे प्रशंसा और स्तुति के योग्य बना देता हुं. (९)
My stothas are the protectors of all and givers of food and enjoyments. People praise Me in two ways for finding cows and finding friendship. When I take the armament in wars for the victory of my stotha, I make it worthy of praise and praise. (9)