ऋग्वेद (मंडल 10)
त्रीणि॑ श॒ता त्री स॒हस्रा॑ण्य॒ग्निं त्रिं॒शच्च॑ दे॒वा नव॑ चासपर्यन् । औक्ष॑न्घृ॒तैरस्तृ॑णन्ब॒र्हिर॑स्मा॒ आदिद्धोता॑रं॒ न्य॑सादयन्त ॥ (६)
तीन हजार तीन सौ उनतालीस देवों ने अग्नि की सेवा की. देवों ने अग्नि को घृत से भिगोया, उनके लिए कुश बिछाए एवं होता बनाकर यज्ञ में बैठाया. (६)
Three thousand three hundred forty-nine gods served the agni; the gods soaked the agni with disgust, laid kushs for them and made them sit in the yagna. (6)