हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.55.4

मंडल 10 → सूक्त 55 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 55
यदु॑ष॒ औच्छः॑ प्रथ॒मा वि॒भाना॒मज॑नयो॒ येन॑ पु॒ष्टस्य॑ पु॒ष्टम् । यत्ते॑ जामि॒त्वमव॑रं॒ पर॑स्या म॒हन्म॑ह॒त्या अ॑सुर॒त्वमेक॑म् ॥ (४)
हे उषा! तुमने नक्षत्र आदि तेजस्वी पदार्थो को सबसे पहले प्रकाश दिया. उसी तेज से तुमने पुष्ट को अधिक पुष्ट बनाया. तुम उन्नत स्थिति वाली हो, तथापि तुम्हारी मित्रता हम निम्न स्थिति वालों के साथ है. यही तुम्हारा एकमात्र महत्त्व और शक्तिपूर्णता है. (४)
Oh, Usha! You first gave light to the bright substances like nakshatra etc. With that speed you made the athletic more athletic. You are having advanced status, however your friendship we have with those of the following positions. That's your only importance and strength. (4)