हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.58.9

मंडल 10 → सूक्त 58 → श्लोक 9 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 58
यत्ते॒ पर्व॑तान्बृह॒तो मनो॑ ज॒गाम॑ दूर॒कम् । तत्त॒ आ व॑र्तयामसी॒ह क्षया॑य जी॒वसे॑ ॥ (९)
तुम्हारा जो मन दूरवर्ती पर्वतों तक गया है, उसे हम वापस बुलाते हैं. तुम इस संसार में निवास करने के लिए जीते हो. (९)
We call back the mind that has gone up to the distant mountains of yours. You live to inhabit this world. (9)