ऋग्वेद (मंडल 10)
प्र ता॒र्यायुः॑ प्रत॒रं नवी॑यः॒ स्थाता॑रेव॒ क्रतु॑मता॒ रथ॑स्य । अध॒ च्यवा॑न॒ उत्त॑वी॒त्यर्थं॑ परात॒रं सु निरृ॑तिर्जिहीताम् ॥ (१)
जिस प्रकार सारथि वाले रथ पर चढ़ा हुआ व्यक्ति सुख प्राप्त करता है, उसी प्रकार सुबंधु की यौवनयुक्त आयु बढ़े. हासवाली आयु का आदमी अपनी मनपसंद आयु प्राप्त करता है. तुम्हारा पाप नष्ट हो. (१)
Just as a person on a chariot with a chariot attains happiness, so so does the young age of Subandhu increase. A man of a lost age attains his preferred age. Your sin is destroyed. (1)