ऋग्वेद (मंडल 10)
इ॒दमि॒त्था रौद्रं॑ गू॒र्तव॑चा॒ ब्रह्म॒ क्रत्वा॒ शच्या॑म॒न्तरा॒जौ । क्रा॒णा यद॑स्य पि॒तरा॑ मंहने॒ष्ठाः पर्ष॑त्प॒क्थे अह॒न्ना स॒प्त होतॄ॑न् ॥ (१)
हिस्सा बांटने वाले माता-पिता ने नाभानेदिष्ट का हिस्सा न देकर जो रुद्रस्तुति की, वही रुद्रस्तुति करके उद्यत-वचन नाभानेदिष्ट अंगिरा गोत्र वाले ऋषियों के यज्ञ में गए एवं भूली हुई बात सात होताओं को बताकर यज्ञ समाप्त किया. (१)
The parents who distributed the part did the rudrastuti by not giving the share of nabhenedishta, did the same rudrastuti and went to the yagna of the sages of the sages of the angira tribe who had forgotten the word and concluded the yajna by telling the forgotten seven hotas. (1)
ऋग्वेद (मंडल 10)
स इद्दा॒नाय॒ दभ्या॑य व॒न्वञ्च्यवा॑नः॒ सूदै॑रमिमीत॒ वेदि॑म् । तूर्व॑याणो गू॒र्तव॑चस्तमः॒ क्षोदो॒ न रेत॑ इ॒तऊ॑ति सिञ्चत् ॥ (२)
वे रुद्रदेव स्तोताओं को धन देने के लिए एवं शत्रुओं को न्ट करने के लिए यज्ञवेदी पर प्रकट हुए एवं शत्रुनाशक अस्त्र उन्हें दिए. बादल जिस प्रकार जल बरसाते हैं, उसी प्रकार शीघ्र गमन वाले एवं उद्यत-वचन रुद्र ने चारों ओर अपनी शक्ति दिखाई. (२)
They appeared on the yajnavedi to give money to rudradeva stothas and to treat the enemies and gave them the enemy-destroying weapons. Just as the clouds rain water, so did the fast-moving and prolific Rudra show his power all around. (2)
ऋग्वेद (मंडल 10)
मनो॒ न येषु॒ हव॑नेषु ति॒ग्मं विपः॒ शच्या॑ वनु॒थो द्रव॑न्ता । आ यः शर्या॑भिस्तुविनृ॒म्णो अ॒स्याश्री॑णीता॒दिशं॒ गभ॑स्तौ ॥ (३)
हे अश्चिनीकुमारो! मैं तुम्हें बुलाता हूं. तुम उस स्तोता का यज्ञ संबंधी प्रयत्न देखकर मन के समान तीव्र गति से यज्ञ की ओर आते हो. जो हव्य लेकर सामने से मुझ यज्ञ में प्रवृत्त यजमान की उंगलियां पकड़कर एवं चरु पकाते हुए तुम्हारा नाम लेता है. (३)
O aschinikumaro! I'll call you. You come towards the yajna at a fast pace like the mind when you see the sacrificial effort of that hymn. Who takes your name from the front by holding the fingers of the host in my yagna and cooking the charu. (3)
ऋग्वेद (मंडल 10)
कृ॒ष्णा यद्गोष्व॑रु॒णीषु॒ सीद॑द्दि॒वो नपा॑ताश्विना हुवे वाम् । वी॒तं मे॑ य॒ज्ञमा ग॑तं मे॒ अन्नं॑ वव॒न्वांसा॒ नेष॒मस्मृ॑तध्रू ॥ (४)
हे स्वर्गपुत्र अश्विनीकुमारो! जिस समय काली रात लाल रंग वाली उषाओं में बदलने लगती है, उस समय मैं तुम्हारा आह्वान करता हूं. मेरे हव्य अन्न की अभिलाषा करने के लिए तुम मेरे यज्ञ में आओ. अश्चों के समान उसे ग्रहण करो और मेरे प्रति द्रोह को भुला दो. (४)
O son of heaven, Ashwinikumaro! At the time when the black night begins to turn into red ushas, I call upon you. You come to my yajna to wish for my good food. Accept him like a curse and forget the hatred towards me. (4)
ऋग्वेद (मंडल 10)
प्रथि॑ष्ट॒ यस्य॑ वी॒रक॑र्ममि॒ष्णदनु॑ष्ठितं॒ नु नर्यो॒ अपौ॑हत् । पुन॒स्तदा वृ॑हति॒ यत्क॒नाया॑ दुहि॒तुरा अनु॑भृतमन॒र्वा ॥ (५)
प्रजापति का पुत्र उत्पन्न करने में समर्थ वीर्य सर्वोत्तम है. प्रजापति ने अपने उस मानव- हितकारी वीर्य का त्याग किया, जिसे उन्होंने अपनी सुंदर उषा के शरीर में सिंचित किया था. (५)
Semen capable of producing the son of Prajapati is the best. Prajapati sacrificed his human-benevolent semen, which he had irrigated in the body of his beautiful Usha. (5)
ऋग्वेद (मंडल 10)
म॒ध्या यत्कर्त्व॒मभ॑वद॒भीके॒ कामं॑ कृण्वा॒ने पि॒तरि॑ युव॒त्याम् । म॒ना॒नग्रेतो॑ जहतुर्वि॒यन्ता॒ सानौ॒ निषि॑क्तं सुकृ॒तस्य॒ योनौ॑ ॥ (६)
जिस समय पिता ने अपनी युवती कन्या के साथ यथेच्छ कर्म किया, उस समय उनके संभोग कर्म के समीप ही थोड़ा वीर्य गिरा. परस्पर अभिगमन करते हुए उन दोनों ने वह वीर्य यज्ञ के ऊंचे स्थान योनि में छोड़ा था. (६)
At the time when the father did a lot of work with his young woman, a little semen fell near his sexual intercourse. While mutually transporting, they both left the semen in the vagina, the high place of the yajna. (6)
ऋग्वेद (मंडल 10)
पि॒ता यत्स्वां दु॑हि॒तर॑मधि॒ष्कन्क्ष्म॒या रेतः॑ संजग्मा॒नो नि षि॑ञ्चत् । स्वा॒ध्यो॑ऽजनय॒न्ब्रह्म॑ दे॒वा वास्तो॒ष्पतिं॑ व्रत॒पां निर॑तक्षन् ॥ (७)
जिस समय पिता ने अपनी पुत्री के साथ संभोग किया उस समय धरती से मिलकर वीर्य त्याग किया. शोभन कर्म वाले देवों ने उसी वीर्य से व्रतरक्षक देव वास्तोष्पति का उत्पादन किया. (७)
At the time when the father had sexual intercourse with his daughter, he gave up semen by meeting the earth. The devas with shobhan karma produced the vratakshan dev vastoshpati from the same semen. (7)
ऋग्वेद (मंडल 10)
स ईं॒ वृषा॒ न फेन॑मस्यदा॒जौ स्मदा परै॒दप॑ द॒भ्रचे॑ताः । सर॑त्प॒दा न दक्षि॑णा परा॒वृङ्न ता नु मे॑ पृश॒न्यो॑ जगृभ्रे ॥ (८)
इंद्र ने नमुचि का वध करने के लिए संग्राम में जिस प्रकार फेन फेंका, उसी प्रकार वास्तोष्पति हमसे दूर जा रहे हैं. अंगिरागोत्रीय ऋषियों ने दक्षिणा के रूप में हमें जो गाएं दी थीं, उन्हें अल्पमन वाले वास्तोष्पति ने स्वीकार नहीं किया, जबकि वे उन्हें ग्रहण करने में समर्थ थे. (८)
Just as Indra threw foam in the struggle to kill Namuchi, the Vastoshpatis are moving away from us. The songs that the Angiragotrian sages had given us as Dakshina were not accepted by the short-minded Vastospati, when they were able to accept them. (8)