हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
ये य॒ज्ञेन॒ दक्षि॑णया॒ सम॑क्ता॒ इन्द्र॑स्य स॒ख्यम॑मृत॒त्वमा॑न॒श । तेभ्यो॑ भ॒द्रम॑ङ्गिरसो वो अस्तु॒ प्रति॑ गृभ्णीत मान॒वं सु॑मेधसः ॥ (१)
हे अंगिरागोत्रीय ऋषियो! तुम लोग यज्ञ संबंधी द्रव्यों एवं दक्षिणा के द्वारा सामूहिक रूप से इंद्र की मित्रता एवं अमरता प्राप्त कर चुके हो. तुम्हारा कल्याण हो. हे शोभन मेधा वाले अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (१)
O Angiragotrian sages! You have collectively attained indra's friendship and immortality through the sacrificial substances and the dakshina. May you have good luck. O shobhan medha wale angirao! You accept my son of Manu at this time. I will do your yajna well. (1)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
य उ॒दाज॑न्पि॒तरो॑ गो॒मयं॒ वस्वृ॒तेनाभि॑न्दन्परिवत्स॒रे व॒लम् । दी॒र्घा॒यु॒त्वम॑ङ्गिरसो वो अस्तु॒ प्रति॑ गृभ्णीत मान॒वं सु॑मेधसः ॥ (२)
हे पितृतुल्य अंगिराओ! तुम हमारे पिता के समान हो. तुम पणियों द्वारा चुराई गई गायों को पर्वत से निकाल लाए थे. तुमने एक वर्ष तक यज्ञ करके बल नामक असुर को नष्ट किया. तुम्हें दीर्घायु प्राप्त हो. हे अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (२)
O fatherly angirao! You are like our father. You brought out the cows stolen by the pangs from the mountain. You destroyed the asura named Bal by performing yajna for a year. You get longevity. O Angirao! You accept my son of Manu at this time. I will do your yajna well. (2)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
य ऋ॒तेन॒ सूर्य॒मारो॑हयन्दि॒व्यप्र॑थयन्पृथि॒वीं मा॒तरं॒ वि । सु॒प्र॒जा॒स्त्वम॑ङ्गिरसो वो अस्तु॒ प्रति॑ गृभ्णीत मान॒वं सु॑मेधसः ॥ (३)
हे अंगिराओ! तुम लोगों ने यज्ञ के द्वारा सूर्य को स्वर्गलोक में स्थापित किया एवं सबकी माता पृथ्वी को प्रसिद्ध किया. तुम्हें शोभन प्रजा प्राप्त हो. हे अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (३)
O Angirao! You have established the sun in paradise through the yajna and made the earth famous for all the mother earth. You get the good people. O Angirao! You accept my son of Manu at this time. I will do your yajna well. (3)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
अ॒यं नाभा॑ वदति व॒ल्गु वो॑ गृ॒हे देव॑पुत्रा ऋषय॒स्तच्छृ॑णोतन । सु॒ब्र॒ह्म॒ण्यम॑ङ्गिरसो वो अस्तु॒ प्रति॑ गृभ्णीत मान॒वं सु॑मेधसः ॥ (४)
हे देवपुत्र अंगिरा ऋषियो! यह नाभानेदिष्ट तुम्हारे यज्ञगृह के कल्याणकारी वचन बोलता है. तुम उसे सुनो. तुम्हें शोभन-ब्रह्मतेज प्राप्त हो. हे अंगिराओ! तुम मुझ मनुपुत्र को इस समय स्वीकार करो. मैं भली प्रकार तुम्हारा यज्ञ करूंगा. (४)
O son of God, Angira Rishis! This nabhanedishta speaks the welfare words of your yajnagriha. You listen to him. You may receive Shobhan-Brahmtej. O Angirao! You accept my son of Manu at this time. I will do your yajna well. (4)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
विरू॑पास॒ इदृष॑य॒स्त इद्ग॑म्भी॒रवे॑पसः । ते अङ्गि॑रसः सू॒नव॒स्ते अ॒ग्नेः परि॑ जज्ञिरे ॥ (५)
ऋषिगण नानारूप वाले हैं एवं अंगिरा गंभीर कर्म वाले हैं. अग्नि के पुत्र के अंगिरा सभी ओर उत्पन्न हुए हैं. (५)
The sages are of various nature and angira are of serious karma. The angiras of the son of agni are born on all sides. (5)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
ये अ॒ग्नेः परि॑ जज्ञि॒रे विरू॑पासो दि॒वस्परि॑ । नव॑ग्वो॒ नु दश॑ग्वो॒ अङ्गि॑रस्तमो॒ सचा॑ दे॒वेषु॑ मंहते ॥ (६)
विविधरूप वाले जो अंगिरा द्युलोक से अग्नि के चारों ओर उत्पन्न हुए हैं, उन्होंने नौ अथवा दस मास तक यज्ञ करके गाय रूप धन प्राप्त किया है. अंगिराओं में सर्वश्रेष्ठ अग्नि देवों के साथ हमें धन देते हैं. (६)
The people of diverse forms who have originated from Angira Duloka around the agni have obtained the wealth of the cow by performing yajna for nine or ten months. The best agni in the Angiras give us wealth with the gods. (6)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
इन्द्रे॑ण यु॒जा निः सृ॑जन्त वा॒घतो॑ व्र॒जं गोम॑न्तम॒श्विन॑म् । स॒हस्रं॑ मे॒ दद॑तो अष्टक॒र्ण्य१॒ः॑ श्रवो॑ दे॒वेष्व॑क्रत ॥ (७)
यज्ञकर्म करने वाले अंगिराओं ने इंद्र के साथ मिलकर गायों और अश्वं से युक्त पशुशाला का उद्धार किया. अंगिराओं में सर्वश्रेष्ठ अग्नि देवों के साथ हमें धन देते हैं. (७)
The angiras who performed the yajnakarma, along with Indra, saved the animal shed containing cows and horses. The best agni in the Angiras give us wealth with the gods. (7)

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 62
प्र नू॒नं जा॑यताम॒यं मनु॒स्तोक्मे॑व रोहतु । यः स॒हस्रं॑ श॒ताश्वं॑ स॒द्यो दा॒नाय॒ मंह॑ते ॥ (८)
वे सावर्णि मनु जल से भीगे बीज के समान शीघ्र बढ़ें. वे हजारों घोड़ों से युक्त सैकड़ों गएं तुरंत देने के लिए तैयार हैं. (८)
They grow quickly like seeds soaked with savarna manu water. They are ready to give away hundreds of horses containing hundreds of horses immediately. (8)
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