ऋग्वेद (मंडल 10)
कु॒विद॒ङ्ग प्रति॒ यथा॑ चिद॒स्य नः॑ सजा॒त्य॑स्य मरुतो॒ बुबो॑धथ । नाभा॒ यत्र॑ प्रथ॒मं सं॒नसा॑महे॒ तत्र॑ जामि॒त्वमदि॑तिर्दधातु नः ॥ (१३)
हे मरुतो! तुमने पहले अनेक बार जैसा हमारी मैत्री को जाना है, उसी प्रकार इस बार भी जानो. धरती की नाभितुल्य जिस वेदी पर हम हव्य से मिलते हैं, वहां देवमाता अदिति हमारे साथ मित्रता करें. (१३)
O Maruto! Just as you have known our friendship many times before, know this time too. At the navel-like altar of the earth where we meet Havya, May Devmata Aditi befriend us. (13)