हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.64.5

मंडल 10 → सूक्त 64 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 64
दक्ष॑स्य वादिते॒ जन्म॑नि व्र॒ते राजा॑ना मि॒त्रावरु॒णा वि॑वाससि । अतू॑र्तपन्थाः पुरु॒रथो॑ अर्य॒मा स॒प्तहो॑ता॒ विषु॑रूपेषु॒ जन्म॑सु ॥ (५)
हे पृथ्वी! तुम सूर्य के जन्म के समय तेजस्वी मित्र एवं वरुण की सेवा करती हो. सूर्य विशाल रथ पर चढ़कर धीरे-धीरे जाते हैं. सात होता वाले सूर्य के अनेक रूप हैं. (५)
O earth! You serve the brightest friend and Varuna at the time of the sun's birth. The sun climbs on a huge chariot and goes slowly. There are many forms of the seven-occurring sun. (5)