ऋग्वेद (मंडल 10)
सर्वे॑ नन्दन्ति य॒शसाग॑तेन सभासा॒हेन॒ सख्या॒ सखा॑यः । कि॒ल्बि॒ष॒स्पृत्पि॑तु॒षणि॒र्ह्ये॑षा॒मरं॑ हि॒तो भव॑ति॒ वाजि॑नाय ॥ (१०)
मित्र के समान आचरण करने वाले एवं सभा में यश प्रदान करने वाले यश को पाकर प्रसन्न होते हैं. यश के कारण पाप दूर होता है. अन्न मिलता है एवं शक्ति प्राप्त होती है. इस प्रकार यश से अनेक प्रकार का हित होता है. (१०)
Those who behave like a friend and give success in the meeting are happy to have success. Because of fame, sin is removed. Food is obtained and strength is obtained. Thus, yash has many kinds of interests. (10)