हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.71.3

मंडल 10 → सूक्त 71 → श्लोक 3 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 71
य॒ज्ञेन॑ वा॒चः प॑द॒वीय॑माय॒न्तामन्व॑विन्द॒न्नृषि॑षु॒ प्रवि॑ष्टाम् । तामा॒भृत्या॒ व्य॑दधुः पुरु॒त्रा तां स॒प्त रे॒भा अ॒भि सं न॑वन्ते ॥ (३)
बुद्धिमान्‌ मनुष्य यज्ञ के द्वारा भाषा का मार्ग जानते हैं. उन्होंने ऋषियों के मन में प्रविष्ट वाणी को जान लिया है. उस भाषा को प्राप्त करके उन्होंने अनेक देशों में फैलाया. सातों छंद इसी भाषा में एकत्र होते हैं. (३)
Wise men know the way of language through yajna. He has come to know the voice that entered the minds of the sages. Having acquired that language, he spread it to many countries. The seven verses are collected in this language. (3)