हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.77.2

मंडल 10 → सूक्त 77 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 77
श्रि॒ये मर्या॑सो अ॒ञ्जीँर॑कृण्वत सु॒मारु॑तं॒ न पू॒र्वीरति॒ क्षपः॑ । दि॒वस्पु॒त्रास॒ एता॒ न ये॑तिर आदि॒त्यास॒स्ते अ॒क्रा न वा॑वृधुः ॥ (२)
मरुद्गण पहले मनुष्य थे और बाद में पुण्य से देव बने. वे अपनी शोभा के लिए आभूषण धारण करते हैं. उन्हें अनेक सेनाएं भी नहीं हरा सकतीं. स्वर्ग के पुत्र ये मरुत्‌ अब दिखाई नहीं देते एवं अदिति के पुत्र ये आक्रमणशील मरुत्‌ नहीं बढ़ते. (२)
The deserts were first human beings and later became gods by virtue. They wear jewellery for their splendor. They can't be defeated by many armies. These deserts, the sons of heaven, are no longer visible, and aditi's sons do not grow these invading deserts. (2)