हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.81.5

मंडल 10 → सूक्त 81 → श्लोक 5 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 81
या ते॒ धामा॑नि पर॒माणि॒ याव॒मा या म॑ध्य॒मा वि॑श्वकर्मन्नु॒तेमा । शिक्षा॒ सखि॑भ्यो ह॒विषि॑ स्वधावः स्व॒यं य॑जस्व त॒न्वं॑ वृधा॒नः ॥ (५)
हे हव्यरूप अन्न धारण करने वाले विश्वकर्मा! तुम्हारे जो परम धाम अथवा उत्तम, मध्यम एवं साधारण शरीर हैं, उन्हें हव्य प्राप्त करके हमे दो. तुम अपने शरीर को बढ़ाते हुए स्वयं यज्ञ करो. (५)
O Vishwakarma who holds food in a havrup! Give us the most auspicious, or the best, the middle and the ordinary body that you have, by attaining the greetings. You do the yajna yourself while increasing your body. (5)