ऋग्वेद (मंडल 10)
त्वं हि म॑न्यो अ॒भिभू॑त्योजाः स्वय॒म्भूर्भामो॑ अभिमातिषा॒हः । वि॒श्वच॑र्षणिः॒ सहु॑रिः॒ सहा॑वान॒स्मास्वोजः॒ पृत॑नासु धेहि ॥ (४)
हे मन्यु! तुम शत्रुओं को हराने वाली शक्ति से संपन्न स्वयं ही उत्पन्न क्रुद्ध शत्रुपराभवकारी सबको देखने वाले, सहनशील एवं शक्तिशली हो. तुम संग्राम में हमें ओज प्रदान करो. (४)
Oh, my! You are the one who sees, tolerant and powerful all of you, who are self-inflicted by the power to defeat your enemies. You give us Oz in Sangram. (4)