ऋग्वेद (मंडल 10)
आभू॑त्या सह॒जा व॑ज्र सायक॒ सहो॑ बिभर्ष्यभिभूत॒ उत्त॑रम् । क्रत्वा॑ नो मन्यो स॒ह मे॒द्ये॑धि महाध॒नस्य॑ पुरुहूत सं॒सृजि॑ ॥ (६)
हे वञ्र के समान सारयुक्त एवं बाण के समान शत्रुनाशक एवं शत्रुपराभवकारी मन्यु! शत्रु को पराजित करना तुम्हारा स्वाभाविक गुण है तथा तुम उत्तम तेज धारण करते हो. तुम यज्ञकर्म के कारण युद्ध में हमारे प्रति स्नेहपूर्ण बनो. बहुत से लोग तुम्हें बुलाते हैं. (६)
O ghostly and explosive like an arrow, o a substance like a forest and an enemy-destroying manu! Defeating the enemy is your natural quality and you possess the best speed. Be affectionate towards us in the war because of the yajnakarma. A lot of people call you. (6)