ऋग्वेद (मंडल 10)
सोमं॑ मन्यते पपि॒वान्यत्स॑म्पिं॒षन्त्योष॑धिम् । सोमं॒ यं ब्र॒ह्माणो॑ वि॒दुर्न तस्या॑श्नाति॒ कश्च॒न ॥ (३)
लोग जब सोमलता को पीसते हैं तभी समझ लेते हैं कि हमने सोमरस पी लिया. ब्राह्मण लोग जिसे सोम समझते हैं, उसे कोई भी नहीं पी सकता. (३)
Only when people grind somalatha do they understand that we drank somras. No one can drink what the Brahmins think of as Som. (3)