हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 10.89.6

मंडल 10 → सूक्त 89 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 10)

ऋग्वेद: | सूक्त: 89
न यस्य॒ द्यावा॑पृथि॒वी न धन्व॒ नान्तरि॑क्षं॒ नाद्र॑यः॒ सोमो॑ अक्षाः । यद॑स्य म॒न्युर॑धिनी॒यमा॑नः श‍ृ॒णाति॑ वी॒ळु रु॒जति॑ स्थि॒राणि॑ ॥ (६)
द्यावा-पृथिवी, उदक, अंतरिक्ष एवं पर्वत जिन इंद्र की समानता नहीं कर सकते, उन्हीं के लिए सोमरस निचोड़ा जाता है. इंद्र का क्रोध जब शत्रुओं पर होता है, उस समय ये दृढ़तापूर्वक शत्रुओं को मारते हैं एवं उनके स्थिर पदार्थो को भी तोड़ डालते हैं. (६)
For those indras whose indra cannot be equal to the indra, the somras is squeezed. When Indra's anger is on the enemies, at that time, he strongly kills the enemies and also breaks their stable substances. (6)