ऋग्वेद (मंडल 10)
पुरु॑ष ए॒वेदं सर्वं॒ यद्भू॒तं यच्च॒ भव्य॑म् । उ॒तामृ॑त॒त्वस्येशा॑नो॒ यदन्ने॑नाति॒रोह॑ति ॥ (२)
जो कुछ हो चुका है अथवा होने वाला है, वह सब विराट पुरुष ही है. वह अमृत का स्वामी है, क्योंकि वह कारण अवस्था छोड़कर जगत् अवस्था को धारण करता है. इस प्रकार प्राणी उसको भोगते हैं. (२)
Whatever has happened or is about to happen, it is all a great man. He is the master of nectar, for he leaves the causal state and holds the world state. In this way, beings enjoy it. (2)