ऋग्वेद (मंडल 10)
अ॒स्मे धे॑हि द्यु॒मतीं॒ वाच॑मा॒सन्बृह॑स्पते अनमी॒वामि॑षि॒राम् । यया॑ वृ॒ष्टिं शंत॑नवे॒ वना॑व दि॒वो द्र॒प्सो मधु॑मा॒ँ आ वि॑वेश ॥ (३)
हे बृहस्पति! तुम एक दीप्तिशालिनी, दोषरहित एवं गमनशील स्तुति को मेरे मुख में धारण करो. उसी स्तुति द्वारा शंतनु के लिए आकाश से वर्षा आवे तथा मधुयुक्त रस टपके. (३)
O Jupiter! You must put in my mouth a radiant, flawless and moving praise. With the same eulogy, rain came from the sky to Shantanu and drip the juice containing honey. (3)