ऋग्वेद (मंडल 10)
यद्दे॒वापिः॒ शंत॑नवे पु॒रोहि॑तो हो॒त्राय॑ वृ॒तः कृ॒पय॒न्नदी॑धेत् । दे॒व॒श्रुतं॑ वृष्टि॒वनिं॒ ररा॑णो॒ बृह॒स्पति॒र्वाच॑मस्मा अयच्छत् ॥ (७)
जब देवापि ने शंतनु का पुरोहित बनकर एवं अग्निहोत्र के लिए वरण प्राप्त करके मेघों द्वारा सुनने योग्य एवं वर्षायाचक स्तोत्र बोला, तब बृहस्पति ने उन्हें बोलने की शक्ति दी. (७)
When Devapi, as a priest of Shantanu and receiving the selection for Agnihotra, spoke a song that was heard and recited by the clouds, Jupiter gave him the power to speak. (7)