ऋग्वेद (मंडल 2)
आ वि॒श्वतः॑ प्र॒त्यञ्चं॑ जिघर्म्यर॒क्षसा॒ मन॑सा॒ तज्जु॑षेत । मर्य॑श्रीः स्पृह॒यद्व॑र्णो अ॒ग्निर्नाभि॒मृशे॑ त॒न्वा॒३॒॑ जर्भु॑राणः ॥ (५)
सब जगह वर्तमान एवं यज्ञ की ओर आने के इच्छुक अग्नि को हम घी के द्वारा सींचते हैं. अग्नि बाधारहित मन से उसे स्वीकार करें. मनुष्यों द्वारा करने योग्य एवं अतिशय प्रिय वर्ण वाले अग्नि पूरी तरह प्रज्वलित हो जाने पर किसी के द्वारा छुए नहीं जा सकते. (५)
Everywhere, we irrigate the present and the agni that is willing to come towards the yagna with ghee. Accept him with a agni-interrupted mind. Fires with the color that are doable and dear to humans cannot be touched by anyone when it is fully ignited. (5)