ऋग्वेद (मंडल 2)
अन्वेको॑ वदति॒ यद्ददा॑ति॒ तद्रू॒पा मि॒नन्तद॑पा॒ एक॑ ईयते । विश्वा॒ एक॑स्य वि॒नुद॑स्तितिक्षते॒ यस्ताकृ॑णोः प्रथ॒मं सास्यु॒क्थ्यः॑ ॥ (३)
यजमान दान करता है. होता उसका वर्णन करता है. अध्वर्यु रूपधारी पशुओं की हिंसा करता हुआ इसी काम के लिए सभी जगह जाता है. ब्रह्मा उसके सब कर्मदोषों का प्रायश्चित्त करता है. हे इंद्र! पहले तुमने ये सब कर्म किए हैं, इसलिए तुम प्रशंसनीय हो. (३)
The host donates. Would describe him. The adhwaryu goes everywhere for the same purpose while committing violence against the animals of the form. Brahma atones for all his karmas. O Indra! You have done all these deeds before, so you are praiseworthy. (3)