ऋग्वेद (मंडल 2)
विश्वे॑भ्यो॒ हि त्वा॒ भुव॑नेभ्य॒स्परि॒ त्वष्टाज॑न॒त्साम्नः॑साम्नः क॒विः । स ऋ॑ण॒चिदृ॑ण॒या ब्रह्म॑ण॒स्पति॑र्द्रु॒हो ह॒न्ता म॒ह ऋ॒तस्य॑ ध॒र्तरि॑ ॥ (१७)
हे बृहस्पति! त्वष्टा ने तुम्हें समस्त संसार से उत्तम बनाया है. तुम समस्त साममंत्रों के ज्ञाता हो. बृहस्पति यज्ञ आरंभ करने वाले यजमान का समस्त ऋण स्वीकार करके उसे उतारते हैं. वै यज्ञ के विद्रोही को नष्ट कर देते हैं. (१७)
O Jupiter! The skin has made you better than the whole world. You are the knower of all the sammantras. Jupiter accepts all the debts of the host who initiates the yajna and removes it. Vais destroy the rebel of the yajna. (17)