ऋग्वेद (मंडल 2)
इन्धा॑नो अ॒ग्निं व॑नवद्वनुष्य॒तः कृ॒तब्र॑ह्मा शूशुवद्रा॒तह॑व्य॒ इत् । जा॒तेन॑ जा॒तमति॒ स प्र स॑र्सृते॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑ ॥ (१)
यज्ञ अग्नि को प्रज्वलित करता हुआ यजमान हिंसक शत्रुओं का नाश करे. स्तोत्र पढ़ने वाले एवं हव्य देने वाले यजमान वृद्धि प्राप्त करें. ब्रह्मणस्पति जिस-जिस यजमान को मित्र के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, वह अपने पुत्र के पुत्र अर्थात् पौत्र से भी अधिक दिन तक जीता है. (१)
The host should destroy the violent enemies by igniting the yagna agni. Get the host enhancement of the psalms and the guests who read the hymn. The host whom the Brahmaspati accepts as a friend lives for more days than the son of his son, that is, his grandson. (1)
ऋग्वेद (मंडल 2)
वी॒रेभि॑र्वी॒रान्व॑नवद्वनुष्य॒तो गोभी॑ र॒यिं प॑प्रथ॒द्बोध॑ति॒ त्मना॑ । तो॒कं च॒ तस्य॒ तन॑यं च वर्धते॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑ ॥ (२)
यजमान अपने वीर पुत्रों की सहायता से हिंसक शत्रुओं की हिंसा करे. वह गायरूप धन का विस्तार करता है एवं स्वयं ही सब कुछ समझता है. ब्रह्मणस्पति जिस-जिस यजमान को मित्र के रूप में स्वीकार कर लेते हैं, वह अपने पुत्र तथा पौत्र से भी अधिक दिन तक जीता है. (२)
Hosts should do violence against violent enemies with the help of their brave sons. He expands the wealth of the cow and understands everything himself. The host whom the Brahmaspatis accept as a friend, he lives for more days than his son and grandson. (2)
ऋग्वेद (मंडल 2)
सिन्धु॒र्न क्षोदः॒ शिमी॑वाँ ऋघाय॒तो वृषे॑व॒ वध्री॑ँर॒भि व॒ष्ट्योज॑सा । अ॒ग्नेरि॑व॒ प्रसि॑ति॒र्नाह॒ वर्त॑वे॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑ ॥ (३)
बृहस्पति की सेवा करने वाला यजमान किनारों को तोड़ने वाली सरिता एवं साधारण बैलों को हराने वाले सांड़ के समान शत्रुओं को अपनी शक्ति से पराजित करता है. ब्रह्मणस्पति जिस-जिस यजमान को मित्र कहकर स्वीकार कर लेते हैं, वह प्रज्वलित अग्नि के समान रोका नहीं जा सकता. (३)
The host serving Jupiter defeats the enemies with his power like Sarita who breaks the edges and the bull who defeats ordinary bulls. Whatever the Brahmaspati accepts as friends, it cannot be stopped like a blazing agni. (3)
ऋग्वेद (मंडल 2)
तस्मा॑ अर्षन्ति दि॒व्या अ॑स॒श्चतः॒ स सत्व॑भिः प्रथ॒मो गोषु॑ गच्छति । अनि॑भृष्टतविषिर्ह॒न्त्योज॑सा॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑ ॥ (४)
स्वर्गीयजल उसके पास न रुकने वाली सरिता के समान आता है, वह सभी सेवकों से पहले गायें प्राप्त करता है एवं अपने अकरणीय बल से शत्रुओं को नष्ट करता है, जिसे ब्रह्मणस्पति मित्र कहकर स्वीकार कर लेते हैं. (४)
The heavenly water comes to him like a sarita who does not stop at him, he receives cows before all the servants and destroys the enemies with his undeserved force, which the Brahmanaspati accepts as a friend. (4)
ऋग्वेद (मंडल 2)
तस्मा॒ इद्विश्वे॑ धुनयन्त॒ सिन्ध॒वोऽच्छि॑द्रा॒ शर्म॑ दधिरे पु॒रूणि॑ । दे॒वानां॑ सु॒म्ने सु॒भगः॒ स ए॑धते॒ यंयं॒ युजं॑ कृणु॒ते ब्रह्म॑ण॒स्पतिः॑ ॥ (५)
उसी की ओर सभी नदियां बहती हैं, वह अविच्छिन्न रूप से समस्त सुख प्राप्त करता है एवं सौभाग्यशाली देवों द्वारा प्रदत्त सुख पाकर बढ़ता है. जिसे ब्रह्मणस्पति मित्र कहकर स्वीकार कर लेते हैं. (५)
Towards Him all the rivers flow, He achieves all the happiness in an uninterrupted manner and grows with the happiness provided by the fortunate gods. Which the Brahmanaspatis accept as friends. (5)