ऋग्वेद (मंडल 2)
शुचि॑र॒पः सू॒यव॑सा॒ अद॑ब्ध॒ उप॑ क्षेति वृ॒द्धव॑याः सु॒वीरः॑ । नकि॒ष्टं घ्न॒न्त्यन्ति॑तो॒ न दू॒राद्य आ॑दि॒त्यानां॒ भव॑ति॒ प्रणी॑तौ ॥ (१३)
जो यजमान आदित्यों के मार्ग का अनुसरण करता है, वह शुचि, शत्रुओं द्वारा अहिंसित, अधिक अन्न का स्वामी, शोभन पुत्रों वाला एवं सुंदर फसलों का अधिपति बनकर जल के समीप निवास करता है. समीप या दूर रहने वाला कोई भी शत्रु उसकी हिंसा नहीं कर सकता. (१३)
The host who follows the path of the Adityas, who lives near the water by becoming pure, un-harmed by enemies, the owner of more food, the owner of shobhan sons and the owner of beautiful crops. No one living near or far away can do violence to him. (13)