हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 2.31.4

मंडल 2 → सूक्त 31 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 31
उ॒त स्य दे॒वो भुव॑नस्य स॒क्षणि॒स्त्वष्टा॒ ग्नाभिः॑ स॒जोषा॑ जूजुव॒द्रथ॑म् । इळा॒ भगो॑ बृहद्दि॒वोत रोद॑सी पू॒षा पुरं॑धिर॒श्विना॒वधा॒ पती॑ ॥ (४)
अथवा संपूर्ण विश्व के पूज्य त्वष्टा देव देवपत्नियों के साथ मिलकर प्रेमपूर्वक हमारे उक्त रथ को आगे बढ़ावें. इड़ा, परम तेजस्वी भग, धरती आकाश, परमबुद्धियुक्त पूषा एवं सूर्या के पति अश्विनीकुमार हमारा रथ चलाएं. (४)
Or, together with the revered gods and goddesses of the whole world, let us move forward our said chariot with love. Ida, the most glorious Bhaga, the earth sky, the most intelligent Pusha and Surya's husband Ashwini Kumar, drive our chariot. (4)