ऋग्वेद (मंडल 2)
यास्ते॑ राके सुम॒तयः॑ सु॒पेश॑सो॒ याभि॒र्ददा॑सि दा॒शुषे॒ वसू॑नि । ताभि॑र्नो अ॒द्य सु॒मना॑ उ॒पाग॑हि सहस्रपो॒षं सु॑भगे॒ ररा॑णा ॥ (५)
हे राका देवी! तुम्हारी जो शोभन रूप वाली उत्तम बुद्धियां हैं एवं जिनके द्वारा तुम यजमान को धन देती हो, आज प्रसन्नचित्त होकर उसी बुद्धि के साथ पधारो. हे सुभगा राका! बुम हजारों प्रकार से हमारा पोषण करती हो. (५)
O Raka Devi! The best of your intellects in the form of adornment and by which you give wealth to the host, come today with the same wisdom in a happy way. Oh, subhaga raka! Bum nourishes us in thousands of ways. (5)