हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 2.35.13

मंडल 2 → सूक्त 35 → श्लोक 13 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 35
स ईं॒ वृषा॑जनय॒त्तासु॒ गर्भं॒ स ईं॒ शिशु॑र्धयति॒ तं रि॑हन्ति । सो अ॒पां नपा॒दन॑भिम्लातवर्णो॒ऽन्यस्ये॑वे॒ह त॒न्वा॑ विवेष ॥ (१३)
सेचन करने वाले अपांनपात्‌ ने उन जलों में गर्भ उत्पन्न किया है. वही बालक बनकर उनका जल पीते हैं एवं जल उनको चाटता है. उज्ज्वल वर्ण वाले वे ही अपांनपात्‌ उस संसार में अन्न रूपी शरीर से व्याप्त हुए हैं. (१३)
The inclined apanpathas have created a womb in those waters. They become children and drink their water and the water licks them. They are the ones with bright colours that have pervaded the world in the form of food. (13)