हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 2.35.15

मंडल 2 → सूक्त 35 → श्लोक 15 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 35
अयां॑समग्ने सुक्षि॒तिं जना॒यायां॑समु म॒घव॑द्भ्यः सुवृ॒क्तिम् । विश्वं॒ तद्भ॒द्रं यदव॑न्ति दे॒वा बृ॒हद्व॑देम वि॒दथे॑ सु॒वीराः॑ ॥ (१५)
हे उत्तम स्थान में रहने वाले अग्नि! हम पुत्र प्राप्ति के लिए तथा यजमान के कल्याण के लिए तुम्हारे पास स्तोत्र लेकर आए हैं. देवगण जो कल्याण करते हैं, वह हमें प्राप्त हो. हम शोभन पुत्र-पौत्र प्राप्त करके इस यज्ञ में बहुत से स्तोत्र बोलेंगे. (१५)
O agni that dwells in the best place! We have brought you hymns for the son-in-law and for the welfare of the host. May we receive the welfare that the gods do. We will receive shobhan's son-grandson and speak many hymns in this yajna. (15)