हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 2.36.4

मंडल 2 → सूक्त 36 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 36
आ व॑क्षि दे॒वाँ इ॒ह वि॑प्र॒ यक्षि॑ चो॒शन्हो॑त॒र्नि ष॑दा॒ योनि॑षु त्रि॒षु । प्रति॑ वीहि॒ प्रस्थि॑तं सो॒म्यं मधु॒ पिबाग्नी॑ध्रा॒त्तव॑ भा॒गस्य॑ तृप्णुहि ॥ (४)
हे बुद्धिमान्‌ अग्नि! इस यज्ञस्थल में देवों को बुलाकर उनके निमित्त यज्ञ करो. हे देवों को बुलाने वाले अग्नि! तुम हमारे हव्य की इच्छा करते हुए तीन स्थानों पर बैठो, उत्तर वेदी पर रखे हुए सोमरूप मधु को स्वीकार करो एवं अग्नीघ्र के पास से अपना हिस्सा लेकर तृप्त बनो. (४)
O wise agni! Call the gods to this place of worship and perform yajna for them. O agni that calls the gods! You sit in three places, wishing for our greetings, accept Somrup Madhu on the north altar and be satisfied with your share from the agneeghar. (4)