हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 2.37.1

मंडल 2 → सूक्त 37 → श्लोक 1 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 37
मन्द॑स्व हो॒त्रादनु॒ जोष॒मन्ध॒सोऽध्व॑र्यवः॒ स पू॒र्णां व॑ष्ट्या॒सिच॑म् । तस्मा॑ ए॒तं भ॑रत तद्व॒शो द॒दिर्हो॒त्रात्सोमं॑ द्रविणोदः॒ पिब॑ ऋ॒तुभिः॑ ॥ (१)
हे द्रविणोदा अर्थात्‌ धनप्रिय अग्नि! होता द्वारा किए हुए यज्ञ में अन्न ग्रहण करके प्रसन्न एवं तृप्त बनो. हे अध्वर्युगण! वे पूर्ण आहुति चाहते हैं. इसलिए उन्हें यह सोम दो. सोम के इच्छुक वे द्रविणोदा वांछित फल देते हैं. हे द्रविणोदा! होता के यज्ञ में ऋतुओं के साथ सोमपान करो. (१)
O Dravinda, that is, the rich agni! Be happy and satisfied by consuming food in the yajna performed by Hota. O teacher! They want full sacrifice. So let them mon it. Willing of Mon they give the desired fruit to Dravinda. O Dravida! Do sompan with the seasons in the yajna of hota. (1)