ऋग्वेद (मंडल 2)
मेद्य॑न्तु ते॒ वह्न॑यो॒ येभि॒रीय॒सेऽरि॑षण्यन्वीळयस्वा वनस्पते । आ॒यूया॑ धृष्णो अभि॒गूर्या॒ त्वं ने॒ष्ट्रात्सोमं॑ द्रविणोदः॒ पिब॑ ऋ॒तुभिः॑ ॥ (३)
हे द्रविणोदा! वे घोड़े तृप्त हों, जिनके द्वारा तुम आते हो. हे वनों के स्वामी! तुम किसी की हिंसा न करते हुए दृढ़ बनो. हे शत्रुपराभवकारी! तुम नेष्टा के यज्ञ में आकर ऋतुओं के साथ सोम पिओ. (३)
O Dravida! Let the horses by which you come be satisfied. O lord of the forests! Be firm while you don't do violence to anyone. O enemy- loser! You come to the yajna of Neshta and drink som with the seasons. (3)