हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 2.40.4

मंडल 2 → सूक्त 40 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 40
दि॒व्य१॒॑न्यः सद॑नं च॒क्र उ॒च्चा पृ॑थि॒व्याम॒न्यो अध्य॒न्तरि॑क्षे । ताव॒स्मभ्यं॑ पुरु॒वारं॑ पुरु॒क्षुं रा॒यस्पोषं॒ वि ष्य॑तां॒ नाभि॑म॒स्मे ॥ (४)
हे सोम व पूषा! तुम में से एक ने उन्नत स्वर्गलोक को अपना निवास बनाया है, दूसरा ओषधि रूप से धरती तथा चंद्र रूप से आकाश में रहता है. तुम हमारे हिस्से का पशुरूपी धन हमें दो, जो अनेक लोगों द्वारा वरणीय एवं अधिक कीर्तिसंपन्न है. (४)
O Mon and Pusha! One of you has made the advanced paradise his abode, the other remains in the earth in medicine and in the sky in the moon. You give us our share of animal wealth, which is preferred and more rewarded by many. (4)