हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 2.7.4

मंडल 2 → सूक्त 7 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 2)

ऋग्वेद: | सूक्त: 7
शुचिः॑ पावक॒ वन्द्योऽग्ने॑ बृ॒हद्वि रो॑चसे । त्वं घृ॒तेभि॒राहु॑तः ॥ (४)
हे शुद्ध, पवित्र करने वाले एवं वंदनीय अग्नि! तुम घृत द्वारा बुलाए गए हो और अत्यंत प्रकाशित हो रहे हो. (४)
O pure, purifying and venerable agni! You are called by the ghrita and are being highly illuminated. (4)