ऋग्वेद (मंडल 3)
त्वद्धि पु॑त्र सहसो॒ वि पू॒र्वीर्दे॒वस्य॒ यन्त्यू॒तयो॒ वि वाजाः॑ । त्वं दे॑हि सह॒स्रिणं॑ र॒यिं नो॑ऽद्रो॒घेण॒ वच॑सा स॒त्यम॑ग्ने ॥ (६)
हे बल के पुत्र अग्नि! रक्षणकार्य एवं अन्न तुम्हारे पास से यजमान के समीप जाता है. तुम द्रोहरहित वचनों से प्रसन्न होकर हमें हजारों प्रकार का धन एवं सत्यशील पुत्र दो. (६)
O son of strength, agni! The protective work and the food goes from you to the host. You, pleased with the ungodly words, give us thousands of riches and a true son. (6)