हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 3.21.4

मंडल 3 → सूक्त 21 → श्लोक 4 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 21
तुभ्यं॑ श्चोतन्त्यध्रिगो शचीवः स्तो॒कासो॑ अग्ने॒ मेद॑सो घृ॒तस्य॑ । क॒वि॒श॒स्तो बृ॑ह॒ता भा॒नुनागा॑ ह॒व्या जु॑षस्व मेधिर ॥ (४)
हे नित्य गतिशाली एवं शक्तिसंपन्न अग्नि! चर्बीरूपी घी की सभी बूंदें तुम्हारे लिए टपकती हैं. हे कवियों द्वारा स्तुत अग्नि! तुम महान्‌ तेज के साथ यज्ञ में आओ. हे मेधावी! हमारे हव्यों का सेवन करो. (४)
O ever-moving and powerful agni! All the drops of fat ghee drip for you. O agni played by the poets! You come to the yagna with great brightness. O meritorious! Consume our vegetables. (4)