हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 3.22.2

मंडल 3 → सूक्त 22 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 22
अग्ने॒ यत्ते॑ दि॒वि वर्चः॑ पृथि॒व्यां यदोष॑धीष्व॒प्स्वा य॑जत्र । येना॒न्तरि॑क्षमु॒र्वा॑त॒तन्थ॑ त्वे॒षः स भा॒नुर॑र्ण॒वो नृ॒चक्षाः॑ ॥ (२)
हे यज्ञ के योग्य अग्नि! तुम्हारा जो तेज आकाश, धरती, ओषधियों एवं जल में है, जिस तेज के द्वारा तुमने अंतरिक्ष को विस्तृत किया है, वह तेज आसमान, दीप्तिमान्‌ सागर के समान विस्तृत एवं मनुष्यों के लिए दर्शनीय है. (२)
O agni worthy of yajna! The glory that you have in the sky, the earth, the herbs, and the water, the brightness by which you have expanded the space, is as wide as the bright sky, the deepest sea, and is as visible to man. (2)