हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 3.25.2

मंडल 3 → सूक्त 25 → श्लोक 2 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 25
अ॒ग्निः स॑नोति वी॒र्या॑णि वि॒द्वान्स॒नोति॒ वाज॑म॒मृता॑य॒ भूष॑न् । स नो॑ दे॒वाँ एह व॑हा पुरुक्षो ॥ (२)
अग्नि स्वयं को विभूषित करके यजमान को सामर्थ्य तथा देवों को अन्न देते हैं. हे बहुविध अन्नयुक्त अग्नि! हमारे कल्याण के निमित्त देवों को इस यज्ञ में लाओ. (२)
By decorating itself, the agni gives power to the host and food to the gods. O multi-grained agni! Bring the gods to this yagna for the sake of our welfare. (2)