ऋग्वेद (मंडल 3)
श॒तधा॑र॒मुत्स॒मक्षी॑यमाणं विप॒श्चितं॑ पि॒तरं॒ वक्त्वा॑नाम् । मे॒ळिं मद॑न्तं पि॒त्रोरु॒पस्थे॒ तं रो॑दसी पिपृतं सत्य॒वाच॑म् ॥ (९)
हे धरती और आकाश! सौ धाराओं वाले सोते के समान कभी क्षीण न होने वाले, मेधावी, पालनकर्ता, वेदवाक्यों का एकत्र संग्रह करने वाले, माता-पिता के समीप प्रसन्नचित्त एवं सत्यवादी उस उपाध्याय को संपूर्ण करो. (९)
O earth and sky! Complete the never-diminishing, meritorious, the follower, the one who collects the Vedas, the cheerful and truthful with the parents, like a hundred streams of sleep. (9)