ऋग्वेद (मंडल 3)
वृष॑णं त्वा व॒यं वृ॑ष॒न्वृष॑णः॒ समि॑धीमहि । अग्ने॒ दीद्य॑तं बृ॒हत् ॥ (१५)
हे कामवर्षक अग्नि! जल बरसाने वाले दीप्तिमान् एवं महान् तुमको घी की आहुति से सींचने वाले हम प्रज्वलित करते हैं. (१५)
O working agni! We light the lights of the water-showering lights and the great ones who irrigate you with the offering of ghee. (15)