ऋग्वेद (मंडल 3)
ईळे॑ अ॒ग्निं वि॑प॒श्चितं॑ गि॒रा य॒ज्ञस्य॒ साध॑नम् । श्रु॒ष्टी॒वानं॑ धि॒तावा॑नम् ॥ (२)
मैं स्तुतियों द्वारा मेधावी, यज्ञ संपन्न करने वाले एवं सुख तथा धन के स्वामी अग्नि की स्तुति करता हूं. (२)
I praise Agni, the bright, the one who performs the yagna and the lord of happiness and wealth, through praises. (2)