ऋग्वेद (मंडल 3)
ए॒ना व॒यं पय॑सा॒ पिन्व॑माना॒ अनु॒ योनिं॑ दे॒वकृ॑तं॒ चर॑न्तीः । न वर्त॑वे प्रस॒वः सर्ग॑तक्तः किं॒युर्विप्रो॑ न॒द्यो॑ जोहवीति ॥ (४)
नदियों ने कहा-“हम दोनों इस जल के द्वारा तृप्त होती हुई इंद्र द्वारा निर्मित सागर की ओर बहती हैं. हमारे गमन का अंत नहीं होगा. यह ब्राह्मण हम दोनों को किस अभिलाषा से पुकार रहा है?” (४)
The rivers said, "We both flow towards the ocean created by Indra, satiating through this water. There will be no end to our movement. With what desire is this Brahmin calling on both of us?" (4)