ऋग्वेद (मंडल 3)
स॒मु॒द्रेण॒ सिन्ध॑वो॒ याद॑माना॒ इन्द्रा॑य॒ सोमं॒ सुषु॑तं॒ भर॑न्तः । अं॒शुं दु॑हन्ति ह॒स्तिनो॑ भ॒रित्रै॒र्मध्वः॑ पुनन्ति॒ धार॑या प॒वित्रैः॑ ॥ (७)
जिस प्रकार समुद्र से मिलने की इच्छा रखने वाली नदियां समुद्र को भरती हैं, उसी प्रकार अध्वर्युगण तुझ इंद्र के निमित्त निचोड़े गए सोम को तैयार करते हुए लताओं को निचोड़ते हैं तथा सोम की धारा से पवित्र भुजाओं द्वारा सोमरस को बनाते हैं. (७)
Just as the rivers that desire to meet the sea fill the sea, so the Adhwaryugans squeeze the vines, preparing the soma squeezed for the sake of your Indra and make the somras through the sacred arms from the stream of soma. (7)