ऋग्वेद (मंडल 3)
श॒तक्र॑तुमर्ण॒वं शा॒किनं॒ नरं॒ गिरो॑ म॒ इन्द्र॒मुप॑ यन्ति वि॒श्वतः॑ । वा॒ज॒सनिं॑ पू॒र्भिदं॒ तूर्णि॑म॒प्तुरं॑ धाम॒साच॑मभि॒षाचं॑ स्व॒र्विद॑म् ॥ (२)
शतक्रतु, जल के स्वामी, मरुतों सहित सर्वजगत् के नेता, अन्नदाता, शत्रु नगरों के भेदनकर्ता, युद्ध में शीघ्र जाने वाले, जल को प्रेरित करने वाले, तेज धारण करने वाले, शत्रुपराभवकारी एवं स्वर्ग प्राप्त कराने वाले इंद्र के पास हमारी स्तुतियां सभी प्रकार से पहुंचें. (२)
May our praises reach indra in all respects to the centurion, the master of water, the leader of all worlds, the annadata, the breaker of enemy cities, the instigator of war, the one who inspires water, the fast-takers, the enemies, and the recipients of heaven. (2)