हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
इन्द्रा॑पर्वता बृह॒ता रथे॑न वा॒मीरिष॒ आ व॑हतं सु॒वीराः॑ । वी॒तं ह॒व्यान्य॑ध्व॒रेषु॑ देवा॒ वर्धे॑थां गी॒र्भिरिळ॑या॒ मद॑न्ता ॥ (१)
हे इंद्र एवं पर्वत! तुम बड़े रथ द्वारा शोभन एवं पुत्र-सहित अन्न लाओ. हे देव! हमारे यज्ञ में हव्य का भक्षण करो एवं उससे प्रसन्न होकर हमारे स्तुति वचनों द्वारा वृद्धि प्राप्त करो. (१)
O Indra and the mountain! You bring food with Shobhan and son by a big chariot. Oh, God! Devour the havya in our yajna and be pleased with it and grow by our praises. (1)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
तिष्ठा॒ सु कं॑ मघव॒न्मा परा॑ गाः॒ सोम॑स्य॒ नु त्वा॒ सुषु॑तस्य यक्षि । पि॒तुर्न पु॒त्रः सिच॒मा र॑भे त॒ इन्द्र॒ स्वादि॑ष्ठया गि॒रा श॑चीवः ॥ (२)
हे मघवा! इस यज्ञ में तुम कुछ समय सुखपूर्वक रहो. यहां से जाओ मत. हम भली प्रकार निचोड़े गए सोम से शीघ्र ही तुम्हारा यज्ञ करते हैं. हे शक्तिशाली इंद्र! पुत्र जिस प्रकार पिता के वस्त्र का छोर पकड़ लेता है, उसी प्रकार हम मधुर स्तुतियां बोलते हुए तुम्हारा वस्त्र पकड़ते हैं. (२)
Oh, this maghwa! In this yajna you should be happy for some time. Don't get out of here. We perform your yajna soon with the well squeezed mon. O mighty Indra! Just as the Son takes hold of the end of the Father's garment, so we hold your garment while speaking sweet praises. (2)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
शंसा॑वाध्वर्यो॒ प्रति॑ मे गृणी॒हीन्द्रा॑य॒ वाहः॑ कृणवाव॒ जुष्ट॑म् । एदं ब॒र्हिर्यज॑मानस्य सी॒दाथा॑ च भूदु॒क्थमिन्द्रा॑य श॒स्तम् ॥ (३)
हे अध्वर्यु! हम दोनों स्तुति करेंगे. तुम मुझे उत्तर दो. हम दोनों इंद्र के लिए प्रिय स्तुतियां करेंगे. तुम यजमान के कुशों पर बैठो. हम दोनों द्वारा इंद्र के लिए किया गया उक्थ प्रशंसनीय हो. (३)
O adhwaryu! We'll both praise. You answer me. We will both do dear praises for Indra. You sit on the thrones of the host. The uqth by both of us for Indra has been plausible. (3)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
जा॒येदस्तं॑ मघव॒न्सेदु॒ योनि॒स्तदित्त्वा॑ यु॒क्ता हर॑यो वहन्तु । य॒दा क॒दा च॑ सु॒नवा॑म॒ सोम॑म॒ग्निष्ट्वा॑ दू॒तो ध॑न्वा॒त्यच्छ॑ ॥ (४)
हे मघवा! पत्नी ही घर है एवं वही पुरुष की योनि है. हरि नामक घोड़े तुम्हें उसी पत्नीयुक्त घर में ले जावें. हम जब कभी सोमरस निचोड़ें, तब तुम्हारा दूत अग्नि तुम्हारे सामने आ जाए. (४)
Oh, this maghwa! The wife is home and the same is the man's vagina. Let a horse named Hari take you to the same wife's house. Whenever we squeeze the somras, let your angel agni come before you. (4)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
परा॑ याहि मघव॒न्ना च॑ या॒हीन्द्र॑ भ्रातरुभ॒यत्रा॑ ते॒ अर्थ॑म् । यत्रा॒ रथ॑स्य बृह॒तो नि॒धानं॑ वि॒मोच॑नं वा॒जिनो॒ रास॑भस्य ॥ (५)
हे धन के स्वामी इंद्र! तुम या तो इस यज्ञ से अपने निवासस्थान पर जाओ अथवा इस यज्ञ में आओ. हे भरणकर्त्ता इंद्र! दोनों स्थानों पर तुम्हारा प्रयोजन है. वहां जाने के लिए अपने विशाल रथ पर बैठो तथा यहां रहने के लिए हिनहिनाते हुए घोड़ों को रथ से अलग कर दो. (५)
O Lord of wealth Indra! You either go to your abode from this yajna or come to this yajna. O filler Indra! Both places have your purpose. Sit on your huge chariot to get there and separate the horses from the chariot to stay here. (5)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
अपाः॒ सोम॒मस्त॑मिन्द्र॒ प्र या॑हि कल्या॒णीर्जा॒या सु॒रणं॑ गृ॒हे ते॑ । यत्रा॒ रथ॑स्य बृह॒तो नि॒धानं॑ वि॒मोच॑नं वा॒जिनो॒ दक्षि॑णावत् ॥ (६)
हे इंद्र! यहीं ठहर कर सोम पिओ और अपने घर जाओ. तुम्हारे घर में सुंदरी एवं कल्याणी पत्नी है. घर जाने के लिए तुम अपने विशाल रथ पर बैठो अथवा यहां ठहरने के लिए घोड़ों को खोलकर खाने-पीने दो. (६)
O Indra! Stay here and drink mon and go to your house. Sundari & Kalyani is the wife in your house. Sit on your huge chariot to go home, or open the horses to stay here and let them eat and drink. (6)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
इ॒मे भो॒जा अङ्गि॑रसो॒ विरू॑पा दि॒वस्पु॒त्रासो॒ असु॑रस्य वी॒राः । वि॒श्वामि॑त्राय॒ दद॑तो म॒घानि॑ सहस्रसा॒वे प्र ति॑रन्त॒ आयुः॑ ॥ (७)
हे इंद्र! यज्ञ करने वाले ये सुदासवंशी भोज नामक क्षत्रिय, उनके याजक अनेक अंगिरागोत्रीय ऋषि एवं देवों से बलवान्‌ रुद्र के पुत्र मरुत्‌ इस अश्वमेध यज्ञ में गुरु विश्वामित्र को महान्‌ धन देते हुए मेरे धन को बढ़ावें. (७)
O Indra! These yagyas, the Kshatriyas named Sudasvanshi Bhoja, their priests, many angiragotriya sages and gods, may the son of The Lord Rudra, the son of Balvan Rudra, increase my wealth by giving great wealth to Guru Vishwamitra in this ashwamedha yajna. (7)

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 53
रू॒पंरू॑पं म॒घवा॑ बोभवीति मा॒याः कृ॑ण्वा॒नस्त॒न्वं१॒॑ परि॒ स्वाम् । त्रिर्यद्दि॒वः परि॑ मुहू॒र्तमागा॒त्स्वैर्मन्त्रै॒रनृ॑तुपा ऋ॒तावा॑ ॥ (८)
इंद्र इच्छानुसार रूप बदल लेते हैं. माया करते हुए इंद्र अपने शरीर को नाना प्रकार का बनाते हैं. सत्ययुक्त होकर भी बिना ऋतु के सोमपान करने वाले इंद्र अपने स्तुति-मंत्रों से बुलाए जाने पर एक मुहूर्त में स्वर्गलोक से तीनों सवनों के यज्ञों में पहुंच जाते हैं. (८)
Indra changes the form according to his will. While doing Maya, Indra makes his body of various kinds. Indra, who performs sompan without the season despite being truthful, reaches the yagnas of the three saavans from the heavenly place in one muhurat when called with his hymns of praise and mantras. (8)
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