ऋग्वेद (मंडल 3)
म॒हत्तद्वः॑ कवय॒श्चारु॒ नाम॒ यद्ध॑ देवा॒ भव॑थ॒ विश्व॒ इन्द्रे॑ । सख॑ ऋ॒भुभिः॑ पुरुहूत प्रि॒येभि॑रि॒मां धियं॑ सा॒तये॑ तक्षता नः ॥ (१७)
हे मेधावी देवो! जिस कर्म से तुमने इंद्रलोक में देवत्व प्राप्त किया है, तुम्हारे वे कर्म महान् हैं. हे बहुतों द्वारा बुलाए गए एवं ऋभुओं के साथी इंद्र! हमारी यह स्तुति धन प्राप्त करने के लिए स्वीकार करो. (१७)
O bright gods! The deeds by which you have attained divinity in Indraloka, those deeds of yours are great. O Indra, who has been called by many and the companions of the sages! Accept our praise for receiving wealth. (17)