ऋग्वेद (मंडल 3)
सदा॑ सु॒गः पि॑तु॒माँ अ॑स्तु॒ पन्था॒ मध्वा॑ देवा॒ ओष॑धीः॒ सं पि॑पृक्त । भगो॑ मे अग्ने स॒ख्ये न मृ॑ध्या॒ उद्रा॒यो अ॑श्यां॒ सद॑नं पुरु॒क्षोः ॥ (२१)
हे अग्नि! हमारा मार्ग सुगम एवं अन्न से पूर्ण हो. हे देवगण! मधुर जल से ओषधियों को सींचो. हे अग्नि! तुम्हारी मित्रता प्राप्त करके हमारा धन नष्ट न हो. हम धन एवं प्रभूत अन्न का स्थान प्राप्त करें. (२१)
O agni! May our path be smooth and complete with food. O Gods! Irrigate the herbs with sweet water. O agni! Do not waste our money by getting your friendship. Let us get the place of wealth and rich food. (21)