हरि ॐ

ऋग्वेद (Rigved)

ऋग्वेद 3.54.6

मंडल 3 → सूक्त 54 → श्लोक 6 - संस्कृत मंत्र, हिंदी अर्थ और English translation

ऋग्वेद (मंडल 3)

ऋग्वेद: | सूक्त: 54
क॒विर्नृ॒चक्षा॑ अ॒भि षी॑मचष्ट ऋ॒तस्य॒ योना॒ विघृ॑ते॒ मद॑न्ती । नाना॑ चक्राते॒ सद॑नं॒ यथा॒ वेः स॑मा॒नेन॒ क्रतु॑ना संविदा॒ने ॥ (६)
कवि एवं मानवों को देखने वाले सूर्य इस धरती-आकाश को सभी जगह देखते हैं. प्रसन्न, जल एवं ओषधियों को धारण करने वाले तथा समान कर्मो द्वारा एकता को प्राप्त धरती-आकाश जल के उत्पत्ति स्थल अंतरिक्ष में इस प्रकार अलग-अलग स्थानों में रहते हैं, जैसे पक्षी अपने घोंसले अलग-अलग बनाते हैं. (६)
The sun, who sees poets and human beings, sees this earth and sky everywhere. The origins of the earth-sky water, which are happy, possessing water and herbs and attaining unity through the same deeds, live in different places in space, as birds build their nests separately. (6)