ऋग्वेद (मंडल 4)
प्रत्य॒ग्निरु॒षसो॑ जा॒तवे॑दा॒ अख्य॑द्दे॒वो रोच॑माना॒ महो॑भिः । आ ना॑सत्योरुगा॒या रथे॑ने॒मं य॒ज्ञमुप॑ नो यात॒मच्छ॑ ॥ (१)
जातवेद अग्नि देव तेजों से दीप्त उषा को लक्ष्य करके बढ़ते हैं. हे परम गतिशाली अश्विनीकुमारो! तुम रथ द्वारा हमारे यज्ञ के सामने आओ. (१)
The Jatveda agni grows by aiming at the glowing Usha with the divine flames. O supremely dynamic Ashwinikumaro! You come in front of our yajna by chariot. (1)
ऋग्वेद (मंडल 4)
ऊ॒र्ध्वं के॒तुं स॑वि॒ता दे॒वो अ॑श्रे॒ज्ज्योति॒र्विश्व॑स्मै॒ भुव॑नाय कृ॒ण्वन् । आप्रा॒ द्यावा॑पृथि॒वी अ॒न्तरि॑क्षं॒ वि सूर्यो॑ र॒श्मिभि॒श्चेकि॑तानः ॥ (२)
सारे संसार के लिए प्रकाश देते हुए सविता देव ऊर्ध्वमुखी किरणों का सहारा लेते हैं. सूर्य ने सबको विशेष रूप से देखते हुए किरणों से धरती, आकाश और अंतरिक्ष को प्राप्त किया है. (२)
Giving light to the whole world, Savita Dev resorts to upward rays. The sun has received the earth, sky and space from the rays, especially looking at everyone. (2)
ऋग्वेद (मंडल 4)
आ॒वह॑न्त्यरु॒णीर्ज्योति॒षागा॑न्म॒ही चि॒त्रा र॒श्मिभि॒श्चेकि॑ताना । प्र॒बो॒धय॑न्ती सुवि॒ताय॑ दे॒व्यु१॒॑षा ई॑यते सु॒युजा॒ रथे॑न ॥ (३)
धनों को धारण करने वाली, लाल रंग युक्त, तेजधारिणी, महान्, किरणों के कारण रंग- बिरंगी एवं जानने वाली उषा आई थीं. उषादेवी सोए हुए प्राणियों को जगाती हुई भली प्रकार जोते गए रथ द्वारा सुख पाने के लिए आती हैं. (३)
Usha, who holds wealth, has come red, sharp-edged, great, colorful and knowing because of the rays. Ushadevi wakes up the sleeping beings and comes to find happiness through a well-plowed chariot. (3)
ऋग्वेद (मंडल 4)
आ वां॒ वहि॑ष्ठा इ॒ह ते व॑हन्तु॒ रथा॒ अश्वा॑स उ॒षसो॒ व्यु॑ष्टौ । इ॒मे हि वां॑ मधु॒पेया॑य॒ सोमा॑ अ॒स्मिन्य॒ज्ञे वृ॑षणा मादयेथाम् ॥ (४)
हे अश्विनीकुमारो! उषाकाल होने पर अधिक बोझा ढोने वाले एवं गतिशील घोड़े तुम्हें इस यज्ञ में सब ओर से लावें. हे कामवर्षियो! यह सोमरस तुम्हारे पीने के लिए है. यज्ञ में सोमपान से प्रसन्न बनो. (४)
O Ashwinikumaro! In the morning, the more burdensome and moving horses should bring you from all sides in this yagna. O kamayars! This sommerus is for you to drink. Be pleased with the sompan in the yajna. (4)
ऋग्वेद (मंडल 4)
अना॑यतो॒ अनि॑बद्धः क॒थायं न्य॑ङ्ङुत्ता॒नोऽव॑ पद्यते॒ न । कया॑ याति स्व॒धया॒ को द॑दर्श दि॒वः स्क॒म्भः समृ॑तः पाति॒ नाक॑म् ॥ (५)
पास में रहने वाले, बंधनरहित एवं ऊर्ध्वमुख-सूर्य को कोई बाधा नहीं पहुंचा सकता. ऊर्ध्वमुख-सूर्य किस शक्ति से चलते हैं? आकाश के खंभे के समान सूर्य स्वर्ग का पालन करते हैं, इसे किसने देखा है? (५)
No one can hinder the sun living nearby, unbonded and upward-facing. With what power does the sun move? The sun like the pillars of the sky follows heaven, who has seen it? (5)