ऋग्वेद (मंडल 4)
भुवो॑ऽवि॒ता वा॒मदे॑वस्य धी॒नां भुवः॒ सखा॑वृ॒को वाज॑सातौ । त्वामनु॒ प्रम॑ति॒मा ज॑गन्मोरु॒शंसो॑ जरि॒त्रे वि॒श्वध॑ स्याः ॥ (१८)
हे इंद्र! वामदेव के यज्ञ के रक्षक बनो. हे हिंसारहित! युद्ध में मेरे मित्र बनो. हे बुद्धिमान्! हम तुम्हारी ओर आते हैं. तुम स्तुतिकर्त्ताओं की सदा प्रशंसा करो. (१८)
O Indra! Be the protector of the yajna of The Left God. Oh, without violence! Be my friend in the war. O wise! We come to your side. Praise the praises of the praises always. (18)